विषय: 💔 अपनों की खामोशी, दूरियों
की पीड़ा और उस अनसुनी पुकार की
कविता — जहाँ अपनापन खो कर भी,
दिल उसे तलाशता रहता है। क्या
मुझ‑सा कोई और हारा है ?
🔷 परिचय:🧠 जब अपनापन शब्द सिर्फ
यादों में रह जाए...
और अपने खामोश हो जाएं —
तो दिल एक सवाल बार-बार करता है...
❓ "क्या मुझ‑सा कोई और हारा है?"
चुप रहकर भी सब कुछ कह जाते हैं,
जो अपनों के लिए लड़े, टूटे, और फिर भी मुस्कुराए।
✍️ मेरी इस रचना में हर उस दिल की आवाज़ है
जिसने कभी अपना सबकुछ सिर्फ "अपनों" के लिए
💔 मेरी कविता उन जज़्बातों की जुबान है जो खो दिया।
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| "जब अपनापन सवाल बन जाए, और दिल जवाब ढूंढता रह जाए — तब एक कविता जन्म लेती है... ✍️ कुमार गुप्ता" |
🤝आओ शुरू करे कुमार✍️ गुप्ता के साथ
💠 क्या मुझ‑सा कोई और हारा है ?
🫂 अपनापन🌹
कभी अपनों को छोड़
कोई खुश रह रहा है क्या?
जो अपनों से अपनों के खातिर लड़ा है,
दूसरों के घरों में वैसा ताला 🔒 जड़ा है क्या?
😶🌫️ अपनों ने चुप रहना सीख लिया,
वो दुनिया से झगड़कर 🥀
चुप रहा है क्या?
🕯️ जलता चराग को बुझा दिया उसने,
क्या उसके लिए कोई चराग बाहर जला है क्या? 🕯️
🔍 मैं क्यूं उसके नाम का दिए लिए ढूंढता फिरता हूँ,
लग रहा है मुझे,
कोई और उससे जला है क्या? 🔥
😢 मैं उसकी आंखें देख समझ जाता हूँ,
बहती उसकी आंखों के दरीया में 🌊
मुझसा कोई और डुबा है क्या?
🌪️ जो हजार आंधियों से लड़कर जला हूँ,
उसे तूफान से बचाने के खातिर
मुझसा कोई और खड़ा है क्या? 🛡️
🍃 ए हवा तू जाकर उसे कहना,
अभी भी वो मुझे अपनी साँसे समझती है क्या? 🌬️💓
🥀 मैं जीत कर भी हार गया,
मुझ सा कोई हारा है क्या?
⚰️ अपनों से लड़कर, बिछड़ कर,
कोई जिंदा रहा है क्या?
🕰️ उसके पास सबकुछ है सिवाए मेरे,
मेरी यादों के सिवाए,
उसके पास कुछ ठहरा है क्या? 💭💔
— ✍️ कुमार गुप्ता
🎯 उद्देश्य: 💔 मेरी कविता "अपनापन" के उस दर्द को बयां करती है,
जहाँ अपने ही चुप हो जाते हैं, और हम सवालों में जलते रहते हैं।
🕯️ ये उन दिलों की आवाज़ है
जो अपनों के लिए सबकुछ हार जाते हैं,
पर फिर भी उम्मीदों का दिया जलाए रखते हैं।
🌪️ "क्या मुझ‑सा कोई और हारा है?" —
यही सवाल इस कविता की रूह है।
🔑 मुख्य बिंदु :
1. 💔 अपनों से दूरी का दर्द — जब अपने ही चुप हो जाते हैं और अपनापन खोने लगता है।
2. 🕯️ त्याग और इंतज़ार — ये कविता उस इंसान की भावना है जो दूसरों के लिए खुद को बुझा देता है।
3. 🌪️ अकेलेपन से लड़ाई — हजार आँधियों से लड़ने के बाद भी मन का तूफान थमता नहीं है।
4. 🧠 भावनात्मक आत्ममंथन —यहाँ हर सवाल दिल से निकला है: "क्या मुझ‑सा कोई और हारा है ?"
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📘 An English version of this poem
is provided below for better
understanding and collaboration.
💔 Theme: A poem of silence,
separation, and that unheard
cry from the heart — where the
feeling of belonging is lost, yet
the soul keeps searching. Has
anyone lost like me?
🔷 Introduction: 🧠
When the sense of belonging becomes just a memory...
and your loved ones fall silent —
the heart keeps asking again and again...
💔 This poem gives voice to emotions that speak everything even in silence —
to those who fought for their loved ones, broke inside, and still managed to smile.
✍️ Within these verses lies the voice of every heart
that once gave up everything... just for the ones they called their own.
❓“Has anyone lost like me?”
🤝 Come, let’s begin — with Kumar✍️ Gupta
💠 Has Anyone Lost Like Me?
🫂 Belongingness 🌹
Has anyone truly been happy after leaving their own?
The one who fought for loved ones —
Has such a lock 🔒 been sealed on someone else’s home?
😶🌫️ Loved ones have learned to stay silent,
But has anyone stayed quiet 🥀
after clashing with the world?
🕯️ He extinguished the burning lamp —
Has anyone lit a flame outside, just for him? 🕯️
🔍 Why do I roam with his name on my lamp,
It feels like —
Is someone else burning for him too? 🔥
😢 I can read it in his eyes,
In the rivers flowing from his gaze 🌊
Has someone else drowned in it like I have?
🌪️ I burned through a thousand storms,
To shield him from his own —
Is there anyone else who stood like me? 🛡️
🍃 Oh wind, go tell him gently —
Does he still breathe thinking it’s me? 🌬️💓
🥀 I won… yet still lost,
Has anyone lost the way I have?
⚰️ Fighting with loved ones, separating from them —
Has anyone truly lived after that?
🕰️ He has everything… except me.
And besides my memories —
Has anything ever stayed with him? 💭💔
— ✍️ Kumar Gupta


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