कविता के माध्यम से, समाज का मार्गदर्शन!

कविता के माध्यम से, समाज का मार्गदर्शन!
जहां शब्द बनते हैं समाज की आवाज!
hindipoetry.in
✍️ कुमार गुप्ता

बिन साहिल का दरिया— एक दर्द भरी दास्ताँ!

विषय:  खुद से जंग, पछतावा 

और अधूरी मोहब्बत! 


✨  परिचय —  कुमार गुप्ता

मैं एक संवेदनशील कवि हूँ, हमारी रचनाएँ जीवन, प्रेम और आत्मसंघर्ष की सच्चाइयों को गहराई से छू कर गुजरती हैं। 


हमारी कविता “कभी ना था वो दरिया जिसका साहिल था मैं” इंसान के भीतर के पछतावे और अधूरी मोहब्बत का सुंदर प्रतिबिंब की प्रस्तुति है।


कभी ना था वो दरिया जिसका साहिल था मैं — अधूरी मोहब्बत, पछतावा और आत्मसंघर्ष पर आधारित कविता | भावनाओं का सफ़र एक दरिया की तरह | yashswarg.blogspot.com | कुमार✍️गुप्ता
💭 भावनाओं का सफ़र —
 एक ऐसा दरिया जिसका कोई किनारा नहीं... ✍️

 कुमार✍️ गुप्ता


आइए महसूस करें —

🌊 कभी ना था वो दरिया जिसका साहिल था मैं। 💭


कभी ना था वो दरिया 🌊, 

जिसका साहिल था मैं |


आंख खुली तो, 

तुझसे अलग के मुकाबिल था मैं 👁️ |


गलतियां करके तुझसे ,

अब शर्मिंदा सा हूं मैं 😔 |


था एक वक्त की ,

सचमुच काबिल सा था मैं 💪 |


किस एहसास से किया था ❤️ जुल्म की

 जिसको याद रखते हो तुम हरदम 😢 |


एक किरदार किया था

 जिसमें कातिल था मैं 🔪 |


कौन था

 जिसने ये हाल किया है मेरा 💔 |

किसको इतनी 

 आसानी से हासिल था मैं 🤲 |


जिन पर मैं थोड़ा सा भी 

आसान हुआ हूं 😞 |

वही बता सकते हैं कि

 कितना मुश्किल था मैं 💭 |


घर में खुद को कैद, 

मैंने आज किया है 🏠 |


तब भी तनहा था ,

जब मोहब्बत किया था मैंने 💘 |


चार पल नहीं साथ बिताए 🕰️,

नाही तैरकर  दरिया को ,

इस पार से उस पार गए 🚣‍♂️ |


ज्यादा चालाकी के चक्कर में ,

बीच में ही डूब गया था मैं⚓ |


कभी ना था वो दरिया ,

जिसका साहिल था मैं 🌊 |


✍️ रचनाकार —


 यशवंत कुमार गुप्ता



🎯 इस कविता का उद्देश्य — जहाँ  “कभी ना था वो दरिया जिसका साहिल था मैं”


इस कविता का उद्देश्य मानव मन की उन गहराइयों को उजागर करना है जहाँ प्यार, पछतावा और आत्मसंघर्ष एक साथ बसते हैं।


मेरी कविता यह संदेश देती है कि मोहब्बत में गलती होना स्वाभाविक है, पर सबसे ज़रूरी है अपने भीतर झांकना और खुद को पहचानना।


 “दरिया” और “साहिल” का प्रतीक यह बताती है कि जीवन में कभी-कभी हम मंज़िल तक नहीं पहुँचते, फिर भी उस सफ़र से बहुत कुछ सीखते हैं।


कविता का मुख्य बिंदु: 


·  💔 पछतावा और आत्ममंथन —

कवि अपने अतीत की गलतियों और अधूरी मोहब्बत को याद करके खुद से सवाल करता है।


·  🌊 “दरिया” और “साहिल” का प्रतीक —

ये प्रतीक जीवन और अधूरी मंज़िलों को दर्शाते हैं; जहाँ कवि खुद को उस दरिया की तरह देखता है जिसका कोई किनारा नहीं।


·  🕊️ अकेलापन और संघर्ष —

कविता यह बताती है कि मोहब्बत के बाद भी इंसान कभी-कभी खुद के अंदर कैद होकर रह जाता है।


·  💫 सीख और आत्मपहचान —

कविता अंततः यह संदेश देती है कि हर दर्द और अधूरापन हमें खुद को पहचानने और बेहतर इंसान बनने की दिशा में ले जाता है।


🌿 अगर यह कविता आपके मन को छू गई

हो, तो नीचे दी गई और रचनाएं भी आपके


दिल को ज़रूर छुएंगी... 💭💚


👇👇📚✨ और कविताएं पढ़ें:


🔹 भारत के सपूत – देशभक्ति कविता संग्रह

जहां हर शब्द में बहादुरी की आवाज़ है।

🔹 सुरक्षा-औद्योगिक कविता संग्रह

जहां मेहनत, अनुशासन और सुरक्षा के रंग बिखरे हैं।

🔹 ज़िंदगी भरी कविता संग्रह

जो जीवन के उतार-चढ़ाव को शब्दों में पिरोती है।

🔹दर्द भरी कविता संग्रह 

🕊 यह संग्रह उन दिलों के लिए है जो टूटी आवाज़ों में भी कविता ढूंढते हैं। 🕊

 🔹 रिश्तों की खुशबू — कविता संग्रह

   👉जहाँ हर कविता एक रिश्ता बयां करती है...

 🔹मस्ती भरी कविता संग्रह

🧋 जब ज़िंदगी को चाहिए थोड़ा मस्ती का स्वाद

🔹 List of Poems / कविताओं की सूची

जहां यशस्वर्ग की हर कविता एक👆 क्लिक की दूरी पर है।



📘 An English version of this poem is provided below for better understanding and collaboration.🌍


🌊 Title:

The River Without a Shore — A Tale of Pain and Regret


Theme:

Self-conflict, Remorse, and Unfinished Love 💭❤️


✨ Introduction — by Kumar Gupta


I am a sensitive poet whose verses touch the truths of life, love, and inner struggle.


My poem “Never was I that river which had a shore” reflects the pain of regret and the shadow of incomplete love —

a mirror to the emotional battles we all carry within. 🌌


Let’s feel it —


💧 The Poem

🌊 Never was I that river, that had a shore…


💭 And I, the wanderer within its flow…


Eyes opened — and I found myself,

Standing apart from you, alone and hollow. 👁️


Made mistakes I can’t deny,

And now I hang my head in sorrow. 😔


Once I was worthy —

Strong, and sure of tomorrow. 💪


But what emotion made me sin? ❤️

What pain still makes you remember my shadow? 😢


I played a part —

A role where I was the killer, not the hero. 🔪


Who was it that left me like this? 💔

Who gained me, so easily though I wasn’t shallow? 🤲


Those who found me even a little simple,

Can tell how difficult I truly was to follow. 💭


Now I’ve locked myself away — 🏠

Alone again, as I was in love’s sorrow. 💘


We shared no moments long enough 🕰️,

Nor crossed the river from this side to the other. 🚣‍♂️


And in the game of cleverness,

Midstream — I drowned, my own betrayer. ⚓


🌊 Never was I that river, that had a shore…

💭 I was just the flow — lost forevermore.


✍️ Poet —


 Yashwant Kumar Gupta


🎯 Purpose of the Poem


The poem “Never was I that river which had a shore” explores the depths of the human heart —

where love, regret, and inner battles coexist. 🌊💔


It reminds us that mistakes in love are human —

but the greatest act is to look within and find who we truly are. 🌱


Through the symbols of the river and the shore,

the poet shows that sometimes, we never reach our destination —

yet every incomplete journey teaches us something profound. 🌅


💫 Key Points


💔 Regret and Introspection —

The poet reflects on his mistakes and lost love, questioning his own past.


🌊 River and Shore Symbolism —

They represent life’s journey and unattained destinations — the poet sees himself as a river without boundaries.


🕊️ Loneliness and Struggle —

Even after love, one may end up locked within their own silence.


✨ Learning and Self-Realization —

Every heartbreak leads to deeper self-awareness and emotional growth.



💬 अपना प्यार और सुझाव ज़रूर बताएं!

👇 कमेंट में लिखें — आपकी राय हमारे लिए ख़ास है ✍️😊
We’d love to hear your feelings and feedback!

💌 Drop a comment below — your words are precious to us. ✨💬

  

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ