कविता के माध्यम से, समाज का मार्गदर्शन!

कविता के माध्यम से, समाज का मार्गदर्शन!
जहां शब्द बनते हैं समाज की आवाज!
hindipoetry.in
✍️ कुमार गुप्ता

🔥 काला धन, सफेद झूठ — सियासत की आग में जलता आम इंसान🙏


विषय: तंत्र की तपिश में तन्हा इंसान जहाँ सत्ता के तमाशे में खोया सुकून!

 

📜 कविता का परिचय:

शीर्षक: मै धीरे-धीरे जल रहा हूंँ! 

🔥 मेरी कविता एक आम नागरिक की पीड़ा और सियासी घटनाओं की छाया में सुलगते जीवन का दस्तावेज़ है।


 💸 नोटबंदी और 🔒 लॉकबंदी जैसे दो बड़े राष्ट्रीय फैसलों के बीच फंसे इंसान की भावनाओं की गहराई से उभरती हैं।


 👥 भीड़ में भी अकेलेपन का एहसास, और सत्ता के तमाशे में खोते हुए अपनेपन की तलाश — यही इस रचना की आत्मा है। 


🌙 तारे गिनते हुए चाँद की कमी, और दिन-रात के बीच खोता सुकून — कविता एक गहरी उदासी और सवालों से भरी है। 


🗣️ यह रचना सिर्फ एक शिकायत नहीं, बल्कि एक सशक्त आवाज़ है — जो व्यवस्था से जवाब मांगती है, और समाज को सोचने पर मजबूर करती है।


कविता "काला धन, सफेद झूठ" का दृश्य — एक आम इंसान की पीड़ा, सत्ता के फैसलों और नोटबंदी से लॉकबंदी तक खोए सुकून को दर्शाती पंक्तियाँ।
💭 कभी-कभी इंसान नहीं जलता — हालात जलाते हैं।
🔥 "काला धन, सफेद झूठ"
उसी आवाज़ 
की सच्चाई है! 

जहाँ सत्ता के फैसलों की तपिश में भी
एक आम दिल अब भी उम्मीद ढूंढता है 🌙✨
💪 चलो सवाल उठाएँ,
क्योंकि चुप रहना भी एक झूठ बन जाता है।

✍️ — कुमार गुप्ता
🌐 yashswarg.blogspot.com


आइए महसूस करें —


काला धन, सफेद झूठ


🌑 मैं धीरे-धीरे जल रहा हूं... 

😔 यूं ना समझना कि मैं बुझ गया हूं।

 🔥 धीरे-धीरे सुलग रहा हूं। 

💸 नोटबंदी हो या 🔒 लॉकबंदी — 

👀 दोनों में तमाशा देख रहा हूं।


📉 पहले नोटबंदी आया, 

🚶 हम घर के बाहर लाइन में नज़र आया। 🏠

 बाद में लॉकबंदी आया, 

😷 हम घर के अंदर नज़र आया।


💰 तभी तो काला धन 

सफेद नज़र आया। 

⏳ हद हो गई यार 

दिन और रात के चक्कर में — 

🙅‍♂️ नाम ना आया अन्ना का, 

🙅‍♂️ नाम ना आया मोदी का।

 😞 सबने गवाया, 

पर कोई वापस ना लाया।


☠️ दोनों में 

ज़हर ही नज़र आया। 

🥃 सबको पीके देखा मैंने, 

👤 मगर कोई अपना नज़र नहीं आया।


🌌 आज हम अकेले बैठ

 तारे गिन रहे हैं, 

🌙 मगर उन तारों में

 हमारा चाँद ना नज़र आया। 


🌞 अब तो दिन और रात में भी 

😴 हमारा सुकून, चैन, नींद 

कहाँ नज़र आया। 

🔥 इन सबके बीच — 

🧍‍♂️ सिर्फ जलता मैं ही नज़र आया।


✍️ रचनाकार:

 यशवंत कुमार गुप्ता


🔥 इस कविता का उद्देश्य है —


व्यवस्था की नीतियों के पीछे छिपे तमाशे को उजागर करना। 


आम इंसान की असहायता और अकेलेपन को सामने लाना। 


सत्ता के दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाना। 


और समाज को जागरूक करना कि हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती। 


🌙 कविता तारे गिनते उस इंसान की बात करती है — जो चाँद से महरूम है। 😔 यह रचना सिर्फ एक शिकायत नहीं, बल्कि एक सचेत चेतावनी है — कि अगर हम चुप रहे, तो सुलगते रहेंगे... धीरे-धीरे।


मुख्य बिंदु:


🔥 आम नागरिक की पीड़ा: कविता में एक साधारण इंसान की भावनाएं हैं, जो नोटबंदी और लॉकबंदी जैसे बड़े फैसलों के बीच सुलगता रहा — ना कोई सहारा, ना कोई समाधान।


💸 सत्ता के फैसलों पर सवाल: रचना में यह दिखाया गया है कि कैसे काले धन को सफेद करने की कोशिशों में आम जनता ने सब कुछ खोया, लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं मिला।


🕯️ प्रतीकात्मक जलन का रूपक: "धीरे-धीरे जलना" सिर्फ शारीरिक पीड़ा नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक सुलगन का प्रतीक है — एक ऐसा दर्द जो दिखता नहीं, पर महसूस होता है।


🗣️ मौन विरोध की शैली: कविता में कोई नारा नहीं, कोई शोर नहीं — लेकिन हर पंक्ति एक मौन चीख है, जो सत्ता से नहीं, समाज से संवाद करना चाहती है।


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📘 An English version of this poem is provided below for better understanding and collaboration.🌍


🖋️ Title: Black Money, White Lies


📘 Theme:


A lonely soul caught in the system’s heat — where peace is lost in the circus of power! 💸🔥



📜 Poem Introduction:


Title within: I’m Burning Slowly...🕯️


This poem is a cry from the heart of an ordinary man —


a witness to the chaos between Demonetization 💸 and Lockdown 🔒,


lost in lines, silence, and questions that never got answers.


Even amid the crowd, he feels utterly alone;

his peace is buried under the noise of promises and power.


Counting stars 🌌 but missing his own moon 🌙,


he stands as a symbol of every citizen —

who burns quietly while pretending to survive.


This is not just a complaint —

it’s a powerful voice that dares to question the system


and remind society what humanity truly means. 🗣️🔥




Black Money, White Lies


🌑 I’m burning slowly,

😔 Don’t think I’m gone,

🔥 I’m just smoldering —

Watching the circus go on.


💸 When demonetization came,

🚶 We stood in lines, outside in pain.

Then lockdown struck,

😷 We were trapped inside again.


💰 Black money turned white,

But our dreams lost their light.

⏳ In the race of day and night,

🙅‍♂️ No name of Anna, no Modi in sight.


😞 Everyone lost something dear,

But nothing ever came near —

☠️ All I saw was poison spread,

🥃 Everyone drank it, peace was dead.


👤 I saw the world but none my own,

🌌 Counting stars, sitting alone.

🌙 Among them all, my moon was gone —

🌞 Even in day, no calm, no dawn.


🔥 Between all this noise and cry,

🧍‍♂️ Only I kept burning —

Slowly... quietly... asking why.


✍️ Written by: 


Yashwant Kumar Gupta




🎯 Purpose of the Poem:


🔥 To expose the silent drama behind political decisions.

💸 To voice the helplessness of the ordinary man caught in the system.

🗣️ To question the double standards of power.

🌙 To remind us that not every glitter is gold — and silence, too, can scream.


This poem is about that man who counts stars 🌌

but finds no moon 🌙 —

a symbolic warning that if we stay silent,

we’ll keep burning… slowly. 🕯️


🌟 Key Highlights:


🔥 Pain of the Common Man: Reflects the emotional suffering of citizens during demonetization & lockdown — no help, no answers.


💸 Questioning Power: Shows how political actions aimed at "cleaning black money" only hurt the ordinary people.


🕯️ Symbolism of Fire: “Slow burning” stands for both mental and social agony — invisible, yet intense.


🗣️ Silent Protest: No slogans, no rebellion — just a quiet scream asking society to wake up.



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