🌿 ओडिशा यात्रा — भाग 4
धवलगिरि: युद्ध से करुणा की ओर....
ओडिशा यात्रा के अगले पड़ाव में आपका स्वागत है।
भाग 1 में हमने भक्ति का अनुभव किया,
भाग 2 में प्रकृति की शांति को महसूस किया,
और भाग 3 में कोणार्क में समय को पत्थरों में ठहरते देखा।
अब यात्रा हमें उस धरती पर ले जा रही है, जहाँ इतिहास ने दिशा बदली थी।
आज हम चलेंगे धवलगिरि की ओर — जहाँ कलिंग युद्ध की ज्वाला के बाद
सम्राट अशोक के हृदय में करुणा का उदय हुआ।
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युद्ध से भी बड़ा होता है परिवर्तन। 🕊️ |
यह केवल एक स्थान नहीं, यह परिवर्तन की भूमि है।
आइए, इस पवित्र धरा पर युद्ध से शांति तक की उस यात्रा को महसूस करें।
विषय : धवलगिरी — जहाँ कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने शांति और करुणा का मार्ग अपनाया।
परिचय :अब हमसब मिलकर अपना कदम बढ़ाते हैं उस धरा की ओर,
जहाँ कलिंग युद्ध की ज्वाला के बाद
सम्राट अशोक के हृदय में करुणा का उदय हुआ —धवलगिरी। 🕊️
धवलगिरी: प्रकृति की श्वेत शांति 🤍
धवलगिरी पहुँचा तो ऐसा लगा,
पहाड़ नहीं — मानो कोई पर्वत आत्मा के भीतर खड़ा हो।
सफ़ेद चट्टानों पर टिकी शांति,
मानो कोई पवित्र शिखर हो —
यह केवल स्थान नहीं,
यह बुद्ध की भूमि है। 🕊️
जहाँ सम्राट अशोक की तलवारें
बुद्ध के आगे झुक गईं।
सफ़ेद चट्टानों पर टिका मंदिर
आत्मा को परमात्मा से मिला देता है,
मन के भीतर गहराई तक उतर जाता है।
हवा बहुत धीमे से बोली —
“बहुत भाग-दौड़ कर ली है,
अब थोड़ी देर बस सांसें ले लो…” 🌬️
वहाँ की खामोशी खाली नहीं थी,
वह शांति थी —
जो हर थकान को
मंत्रमुग्ध कर देती है।
चंद पल आँखें बंद कीं,
तो आभास हुआ —
जीवन निस्वार्थ का नाम है।
श्वेत चादर ओढ़े धवलगिरी में
बुद्ध शांति के दूत बनकर
आज भी खड़े हैं।
सम्राट अशोक भी समझ गए थे —
न कुछ लेकर आए हैं,
न कुछ लेकर जाएंगे।
तलवार हाथ में थी,
पर मन हार चुका था।
“क्या अपनी ही तलवार से
अपना अंत कर लूँ?”
तभी बुद्ध की करुणा बोली —
“तुम हार कर भी जीत गए हो।”
और इतिहास ने वहीं करवट ली।
अब अपनी अनुभूति कहूँ —
धवलगिरी की श्वेत धरती पर
शांति का एहसास निराला है।
हवा भी यहाँ मंदिर सी लगती है,
हर सांस पर प्रकृति का पहरा है। 🌿
बुद्ध के सामने खड़े होकर लगा —
मानो भगवान के चरण छू लिए हों।
एक और रहस्य बताऊँ —
धवलगिरी के पीछे एक शिव जी का मंदिर है।
और भाग 5 में
हम चलेंगे लिंगराज मंदिर की ओर,
जहाँ यह यात्रा और भी मंगलमय होगी। 🔔
— कुमार गुप्ता ✍️
🌿 🌿 आज यहीं विश्राम करते हैं।
कल मिलते हैं — भाग 5 में।
अगले पड़ाव में चलेंगे लिंगराज मंदिर की ओर,
जहाँ शिव और विष्णु के अद्भुत संगम के दर्शन होंगे।
दर्शन की यह शोभा यात्रा जारी है।
कल अवश्य जुड़िए —सफ़र अभी बाकी है।
📖 यदि आपने पहले भाग नहीं पढ़े हैं तो यहाँ दिए गए लिंक पर क्लिक करें।
✍️ओडिशा यात्रा – भाग 1
🛕 पुरी का जगन्नाथ: भक्ति का पहला एहसास ।
🐧• आस्था, इतिहास और प्रकृति का दिव्य संगम 🕊️।
. ✍️ओडिशा यात्रा – भाग 2
🛕 – गोल्डन बीच सुनहरी लहरों का गीत ।
🐧• लहरों में ढलता सूरज शाम का सुनहरा एहसास🕊️।
🛕ओडिशा यात्रा — भाग 3 - कोणार्क की गाथा।
🐧समय का पत्थरों में, ठहरा चमत्कार।
📚 तब तक दिल से लिखी और भी कविताएँ पढ़ें
सफ़र अभी जारी है,
तो यहीं मत रुकिए —
भावनाओं से भरी कई कहानियाँ आपका इंतज़ार कर रही हैं 🌿✨
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🔹 आईए पढ़े भाग संख्या - 1: रास्तों से नहीं, ज़िंदगी से मुलाक़ात 🚶♂️✨
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हर कविता में छुपी है एक नई अनुभूति,
एक नया एहसास... 💜❤
📘 An English translation of this poem is provided below for better understanding and collaboration. 🌍
Title:
Odisha Journey — Part 4: Dhauli — From War to Compassion
Subject:
Dhauli — the sacred land where, after the Kalinga War, Emperor Ashoka chose the path of peace and compassion.
Introduction:
Now let us move together towards that land,
where after the flames of the Kalinga War,
compassion rose in the heart of Emperor Ashoka —
Dhauli. 🕊️
Dhauli: The White Peace of Nature 🤍
When I reached Dhauli,
it felt like more than a hill —
it felt like a mountain rising within the soul.
The white rocks carried a deep silence,
like a sacred peak of peace.
This is not just a place —
this is the land of Buddha. 🕊️
It is believed that here,
the swords of Emperor Ashoka bowed before compassion.
The white temple standing calmly on the hill
connects the soul to the Divine
and touches the heart deeply.
The wind whispered softly —
“You have run enough in life…
now pause, and just breathe.” 🌬️
The silence here is not emptiness.
It is peace —
a peace that removes every tiredness
and fills the heart with calm.
When I closed my eyes for a few moments,
I felt something clearly —
life is about selflessness.
In Dhauli’s white serenity,
Buddha still stands
as a messenger of peace.
Emperor Ashoka must have realized —
we come with nothing,
and we leave with nothing.
The sword was in his hand,
but his heart had surrendered.
“Should I end myself with my own sword?”
And then compassion answered —
“You have lost the war,
but you have won yourself.”
At that moment,
history changed its direction.
Personally, I felt something unique —
on the white land of Dhauli,
peace feels different.
Even the air feels like a temple,
and every breath feels protected by nature. 🌿
Standing before Buddha,
it felt as if I had touched the feet of the Divine.
There is also a small Shiva temple behind Dhauli.
And in Part 5,
we will move towards the famous
Lingaraj Temple,
where this journey becomes even more divine. 🔔
— Kumar Gupta ✍️
📚 Until then, explore more heartfelt poems —
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✍️ Not a Meeting with Roads, but with Life 🚶♂️✨
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